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मोहदा पंचायत विवाद: महिला आयोग में सरपंच की ‘मानसिक प्रताड़ना’ की शिकायत खारिज

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रायपुर : आयोग ने लगाई फटकारबिना वकील के उपसरपंच ने लड़ा केस, ठोस दस्तावेजों के आगे ढह गए सरपंच के आरोप उपसरपंच बोले- “सरपंच ने महिला होने का लाभ उठाने का किया था असफल प्रयास, आज सच जीता”रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग के रायपुर स्थित न्यायालय से स्थानीय राजनीति को झकझोर देने वाली एक बड़ी खबर सामने आई है। ग्राम पंचायत मोहदा की सरपंच श्रीमती रेखा प्रहलाद द्वारा उपसरपंच एवं साथी पंचों के खिलाफ दर्ज कराई गई ‘मानसिक प्रताड़ना’ की शिकायत को आयोग ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। मामले की गंभीरता से सुनवाई के बाद महिला आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि सरपंच की यह शिकायत पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित थी। शिकायत खारिज करने के साथ ही आयोग ने महिला सरपंच को कड़ी फटकार भी लगाई है।बिना वकील के उपसरपंच की जोरदार पैरवी, हैरान रह गए लोगइस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प और चर्चा का विषय उपसरपंच का आत्मबल रहा। अनावेदक उपसरपंच ने किसी नामी या पेशेवर वकील को खड़ा करने के बजाय खुद अपने केस की पैरवी की। उन्होंने महिला आयोग के न्यायालय में बिना किसी कानूनी सहारे के, बेहद आक्रामक और तार्किक तरीके से अपना मजबूत बचाव किया। उपसरपंच ने कोर्ट के सामने एक-एक कर ऐसे अकाट्य सरकारी दस्तावेज और सबूत पेश किए, जिससे सरपंच द्वारा लगाए गए सारे आरोप ताश के पत्तों की तरह ढह गए। इन पुख्ता सबूतों के कारण आयोग को भी त्वरित और सही फैसला लेने में बड़ी आसानी हुई।राजनीतिक रंजिश के लिए ‘महिला कार्ड’ का इस्तेमाल गलत: आयोगमहिला आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और दस्तावेजों की जांच के बाद माना कि पंचायत की आपसी खींचतान और राजनीतिक द्वेष के चलते उपसरपंच और पंचों को फंसाने की साजिश रची गई थी। आयोग ने शिकायतकर्ता सरपंच को फटकार लगाते हुए संदेश दिया कि महिला सुरक्षा और अधिकारों के लिए बने इस गरिमामय मंच का उपयोग किसी से व्यक्तिगत या राजनीतिक बदला लेने के लिए कतई नहीं किया जा सकता।”सरपंच का दांव पड़ा उल्टा, आखिरकार सच की जीत हुई”आयोग से क्लीन चिट मिलने के बाद राहत की सांस लेते हुए उपसरपंच ने कहा, “आज आखिरकार न्याय की जीत हुई है और दूध का दूध, पानी का पानी हो गया। सरपंच ने अपने पद और महिला होने का अनुचित लाभ उठाकर हमें प्रताड़ित करने का एक असफल प्रयास किया था। लेकिन न्याय के मंदिर में झूठे आरोपों की नहीं, बल्कि सिर्फ सच और सबूतों की जीत होती है।”यह फैसला अब स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीण राजनीति के जानकारों का कहना है कि यह निर्णय उन लोगों के लिए एक बड़ी नजीर है जो कानून और संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल अपनी निजी रंजिशें भुनाने के लिए करते हैं।

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