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छत्तीसगढ़ में मंत्री और विधायक रील बनाने में व्यस्त, विकास गायब,प्रदेश में विकास नहीं, रील ट्रेंड फल-फूल रही

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रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी दिख रही है। सत्ता के गलियारों में फाइलें नहीं, मोबाइल फोन घूम रहे हैं। मंत्री हों या विधायक—जहाँ जाएँ, पहले कैमरा ऑन होता है, फिर काम की बारी… जो अक्सर आती ही नहीं। प्रदेश में विकास नहीं, रील ट्रेंड फल-फूल रही है।दरअसल प्रदेश की सड़के जर्जर होने पर आम आदमी परेशान है, खेतों में किसान हताश है, युवाओं के हाथ में डिग्री है लेकिन नौकरी नहीं, और सत्ता के गलियारों में—रील, लाइक और व्यूज़ की दौड़।विकास या दिखावाविकास के नाम पर जनता को झुनझुना थमाया जा रहा है। योजनाओं के पोस्टर चमकदार हैं, भाषण भारी-भरकम हैं, लेकिन धरातल पर तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है। महंगाई की मार, खाद-बीज की किल्लत, बिजली-पानी की समस्याएँ—इन पर रीलें कम और जवाब और भी कम।“मोदी की गारंटी”—नारा या हकीकतइन दिनों एक ही नारा गूंज रहा है—“मोदी की गारंटी”। लेकिन सवाल वही पुराना है. गारंटी कागज़ों में है या ज़मीन पर…आम जनता कह रही है—गारंटी अगर है, तो किसानों की तकलीफ क्यों नहीं खत्म हो रही.. युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिल रहा है। शहरों से लेकर गाँवों तक बुनियादी सुविधाएँ क्यों अधूरी हैं।प्रदेश की जनता महँगाई, बेरोज़गारी, बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं और चरमराती शिक्षा व्यवस्था से जूझ रही है। लेकिन सरकार का पूरा ध्यान इस पर है कि कौन-सी रील कितनी वायरल हुई। जनता के सवाल दब रहे हैं, एल्गोरिदम ऊपर जा रहा है। रील में दिखाया जाता है कि “सब ठीक है”, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इससे बिल्कुल उलट है।सत्ता के हाथ में फाइल नहीं, मोबाइलआज छत्तीसगढ़ में सत्ता का चेहरा बदल चुका है। सचिवालय से लेकर सड़क तक एक ही दृश्य है— मोबाइल फोन, ट्राइपॉड, कैमरा, म्यूज़िक और मुस्कुराते चेहरे। परदे पर सब चमकदार है, लेकिन पर्दे के पीछे प्रशासनिक अराजकता साफ़ दिखती है।रील में सुशासन, ज़मीन पर बदहालीजनप्रतिनिधि जनता के सेवक होते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में वे अब इन्फ्लुएंसर की भूमिका में नज़र आ रहे हैं। हर दौरे को “कंटेंट”, हर मुलाकात को “शूट” और हर बयान को “वायरल क्लिप” में बदल दिया गया है।कैमरे में मुस्कान, ज़मीन पर असफलताजनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी शासन चलाना है, न कि रील बनाना। लेकिन छत्तीसगढ़ में तस्वीर उलटी है। यह सवाल अब हर गली-चौराहे पर गूंज रहा है— क्या यह सरकार जनता के लिए बनी है या सोशल मीडिया लाइक्स के लिए….फिर भी सरकार मानो मान बैठी है कि वायरल वीडियो ही विकास का प्रमाण है। यह केवल ट्रेंड नहीं, बल्कि शासन की गंभीर विफलता का संकेत है। जब सत्ता प्रचार में डूब जाए और प्रशासन पंगु हो जाए, तब लोकतंत्र को सबसे बड़ा नुकसान होता है।

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