
हिरमी – रावन: छत्तीसगढ़ का पारंपरिक लोक पर्व ‘छेरछेरा’ आज पूरे प्रदेश सहित ग्रामीण अंचल हिरमी, मोहरा, सकलोर, बरडीह, आलेसुर, भटभेरा, कुथरौद,में हर्षोल्लास और पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया गया। “छेरछेरा, माई कोठी के धान ल हेरी के हेरा” के जयघोष के साथ बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों की टोलियां बाजे-गाजे के साथ घर-घर पहुंचीं। गलियों में गूंजते पारंपरिक गीतों और नृत्य ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया।अन्नदान की गौरवशाली परंपरा सुबह से ही गांव और शहरों की गलियों में उत्साह का माहौल रहा। कहीं संकीर्तन मंडलियों की थाप सुनाई दी, तो कहीं युवा संगीत की धुन पर नाचते-गाते घरों में दस्तक देते नजर आए। घर की गृहणियों ने भी बड़े प्रेम और उत्साह के साथ अपनी कोठी से अन्न (धान) निकालकर दान किया। मान्यता है कि इस दिन दान करने से घर में साल भर सुख-समृद्धि बनी रहती है। जिला पंचायत सभापति ने दी बधाई इस अवसर पर डॉ. मोहनलाल वर्मा (सभापति, उद्योग एवं सहकारिता समिति, जिला पंचायत बलौदाबाजार) ने भी अपनी सहभागिता दर्ज कराई। उन्होंने स्वयं अन्नदान करते हुए क्षेत्रवासियों को पर्व की बधाई दी। डॉ. वर्मा ने छेरछेरा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व हमारी समृद्ध कृषि संस्कृति और ‘साझा करने’ की भावना का प्रतीक है अन्नदान: सबसे श्रेष्ठ दान स्थानीय नागरिक दिलेश्वर मढरिया ने पर्व के आध्यात्मिक और सामाजिक पहलू पर चर्चा करते हुए बताया कि प्राणदान के समान: अन्न को ‘प्राण’ माना गया है, इसलिए अन्नदान को प्राणदान के समान पुण्यकारी माना जाता है। इससे दान देने वाले और लेने वाले, दोनों के चेहरों पर मुस्कान आती है। यह परंपरा सामुदायिक निर्माण और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देती है, जिससे ऊंच-नीच का भेदभाव समाप्त होता है। छेरछेरा का यह पर्व केवल अनाज मांगने का उत्सव नहीं है, बल्कि यह फसल कटने की खुशी और समाज में परस्पर सहयोग व सद्भाव का संदेश देने वाला महापर्व है।छेरछेरा पर्व की आप सभी को अनंत शुभकामनाएं!







