
हिरमी: छत्तीसगढ़ में आस्था और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी का पर्व बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और इसी के साथ सभी शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है।इस पर्व का सबसे प्रमुख आकर्षण रहा घर-घर में भगवान शालीग्राम (भगवान विष्णु का स्वरूप) और माता तुलसी के विवाह का आयोजन, जिसे ग्रामीण अंचलों में एक वास्तविक विवाह की तरह ही धूमधाम से मनाया गया। विवाह की पारंपरिक रस्में: गन्ने का मंडप: हर घर के आंगन में तुलसी के पौधे को दुल्हन की तरह सजाया गया। पवित्र तुलसी के गमले के ऊपर गन्नों का सुंदर मंडप बनाया गया, जो इस विवाह का मुख्य केंद्र रहा।शालिग्राम जी की बारात: कई गाँवों में शालिग्राम जी की छोटी प्रतीकात्मक बारात निकाली गई, जिसे गाजे-बाजे और पारंपरिक लोक गीतों के साथ तुलसी माता के पास लाया गया। महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में एकत्रित होकर विधि-विधान से पूजा की। विवाह की रस्मों में तुलसी को लाल चुनरी, चूड़ी, बिंदी और अन्य सुहाग की सामग्री अर्पित की गई। शालिग्राम जी को पंचामृत से स्नान कराकर पीले वस्त्र पहनाए गए। इस मौके पर पकवानों की भी महक फैली रही। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से शकरकंद (रतालू), सिंघाड़े और तरह-तरह के मौसमी फलों का भोग लगाया गया।मांगलिक गीतों की गूंज: पूरे दिन गाँवों में विवाह के मांगलिक लोक गीतों की गूंज सुनाई दी, जिसने पूरे माहौल को भक्तिमय और आनंदमय बना दिया।ग्रामीण महिला, शैल वर्मा,रमा मढरिया, कुसुम जायसवाल, सीमा वर्मा, सरस्वती, अगेश्वरी ( दिशा ) ने कहा: “तुलसी विवाह हमारे लिए सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि घर में सुख-समृद्धि लाने का त्योहार है। शालिग्राम जी से विवाह कराकर हम माता तुलसी को घर की बहू के रूप में पूजते हैं। दिलेश्वर मढरिया ने बताया की देवउठनी एकादशी का पर्व चातुर्मास (विश्राम काल) की समाप्ति का प्रतीक है। इस दिन भगवान विष्णु के जागने के साथ ही विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे सभी शुभ कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं, जिसका ग्रामीण जनजीवन पर गहरा असर पड़ता है। तुलसी और शालिग्राम का विवाह, असल में, सृष्टि के पालक भगवान विष्णु और पवित्रता की प्रतीक तुलसी के मिलन का उत्सव है, जो दांपत्य जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना के साथ मनाया जाता है। इस प्रकार, ग्रामीण अंचलों में यह पावन पर्व न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना, बल्कि इसने सामुदायिक एकता और पारंपरिक संस्कृति को भी जीवंत बनाए रखा।







