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बिलासपुर: जब कर्तव्य भूल गया डॉक्टर, नसबंदी के बदले मांगे रुपये, न देने पर ‘नरक’ का श्राप!

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बिलासपुर: सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क उपचार और सेवा का दावा तो बहुत किया जाता है, मगर जब डॉक्टर ही मरीजों से अवैध वसूली करने लगे, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजमी है। जिला अस्पताल की चर्चित स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. वंदना चौधरी एक बार फिर विवादों में हैं। नसबंदी के बदले महिला से 6,000 रुपये मांगने और रकम न देने पर ‘नरक’ भेजने का श्राप देने के आरोप में वह प्रशासन के राडार पर आ गई हैं।

वायरल ऑडियो से हुआ बड़ा खुलासा : तखतपुर क्षेत्र के ग्राम सेमरचुआ निवासी जयंत्री पटेल ने नसबंदी के लिए जिला अस्पताल में ऑपरेशन कराया था। आरोप है कि डॉ. वंदना चौधरी ने ऑपरेशन के एवज में 6,000 रुपये की मांग की, जिसमें से 2,000 रुपये उसी वक्त ले लिए गए, जबकि बाकी 4,000 रुपये के लिए महिला को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा। जब महिला ने पैसे देने में असमर्थता जताई, तो डॉक्टर साहिबा ने उसे नरक जाने तक का श्राप दे डाला!

ऑडियो वायरल होते ही प्रशासन में मचा हड़कंप : जयंत्री और उसके परिजनों ने डॉक्टर की इस हरकत का ऑडियो रिकॉर्ड कर लिया और इसे सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। जैसे ही मामला तूल पकड़ा, स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि विभाग को रविवार को ही नोटिस जारी करना पड़ा, जो कि सरकारी ढर्रे में आमतौर पर नहीं देखा जाता।

दिल्ली दूर नहीं, रायपुर जरूर दूर हो गया : इस पूरे मामले में राजधानी से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, जिससे लोगों के मन में सवाल उठने लगे हैं। आखिर क्यों राज्य सरकार अब तक इस गंभीर मामले पर चुप्पी साधे बैठी है? रायपुर से बिलासपुर की दूरी महज 120-125 किलोमीटर ही है, लेकिन न्याय की गति इतनी धीमी क्यों है?

सिविल सर्जन ने थमाया नोटिस :जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. अनिल गुप्ता ने डॉ. वंदना चौधरी को शो-कॉज नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण देने को कहा है। नोटिस में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि उनके खिलाफ अनुशासनहीनता की शिकायत प्राप्त हुई है, जो सेवा शर्तों के खिलाफ है।

आखिर कब तक चलेगा ‘धंधा’ सरकार के नाम पर? : सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क चिकित्सा सेवा का दावा सिर्फ कागजों में दिखता है। नसबंदी के बदले पैसे वसूलना और मरीजों को अपमानित करना एक बेहद गंभीर अपराध है। अब देखना यह होगा कि क्या इस बार सरकार दोषियों पर कोई कड़ी कार्रवाई करेगी या यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह फाइलों में दब जाएगा?

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